Friday, 15 May 2020

मैं अनभिज्ञ नहीं

मौन हूँ, अनभिज्ञ नहीं 
मेरे मौन को कम ना आंकना
मौन हूँ कयोंकि मैं तूफ़ान नहीं चाहती, 
जोड़ना जानती भी हूँ,और चाहती भी। 
जानती हूँ आवाजों से सिर्फ़ शोर होता है 
पत्थर के घर हैं, जज़्बातो की कोई जगह नहीं, 
वहाँ तुम्हारे शब्द उनके 
अहंकार पर प्रहार करते 
और खामोशी जीत का अहसास। 
जीत का अहसास मतलब 
सब कुछ ठीक होना
शान्त होना
उसी शान्ति की चाहत है मुझे 
क्योंकि उसी में जुड़ाव है 
उसके लिए तुम्हारे भीतर
चाहे तूफान हो या मंथन
अपनी अभिलाषा को शब्द ना देना
मौन ही रहना
उन्हें समझने दो की 
तुम अनभिज्ञ हो, अचेतन हो 
तुम्हारे भीतर के 
कोलाहल को तुम्हारे चेतन को,
शब्दों का आवरण दो,
नई परिभाषाएं गठित करो,
नई कविता का सृजन करो।
और उन्हें वही जानने दो 
कि तुम मौन हो 
अनभिज्ञ नहीं।