Friday, 15 May 2020

मैं अनभिज्ञ नहीं

मौन हूँ, अनभिज्ञ नहीं 
मेरे मौन को कम ना आंकना
मौन हूँ कयोंकि मैं तूफ़ान नहीं चाहती, 
जोड़ना जानती भी हूँ,और चाहती भी। 
जानती हूँ आवाजों से सिर्फ़ शोर होता है 
पत्थर के घर हैं, जज़्बातो की कोई जगह नहीं, 
वहाँ तुम्हारे शब्द उनके 
अहंकार पर प्रहार करते 
और खामोशी जीत का अहसास। 
जीत का अहसास मतलब 
सब कुछ ठीक होना
शान्त होना
उसी शान्ति की चाहत है मुझे 
क्योंकि उसी में जुड़ाव है 
उसके लिए तुम्हारे भीतर
चाहे तूफान हो या मंथन
अपनी अभिलाषा को शब्द ना देना
मौन ही रहना
उन्हें समझने दो की 
तुम अनभिज्ञ हो, अचेतन हो 
तुम्हारे भीतर के 
कोलाहल को तुम्हारे चेतन को,
शब्दों का आवरण दो,
नई परिभाषाएं गठित करो,
नई कविता का सृजन करो।
और उन्हें वही जानने दो 
कि तुम मौन हो 
अनभिज्ञ नहीं।
                

Friday, 24 April 2020

ओह विधाता

कुदरत का वो ख़ूबसूरत प्रोग्राम जहां पता नहीं कैसे एक माँ को उसके सपनों में पता चल जाता है कि उसका बच्चा ख़तरे में है या गिरने वाला है।अमूमन ख़तरे का एहसास या उसकी प्यास , वो गीला है लगभग ऐसे सारे एहसास कैसे आपको वो कुदरत सपनो के माध्यम से दे जाता है .. उसी भाव को एक कविता का रूप देने को छोटी सी कोशिश 

प्रणाम है प्रकृति के उस 
रचयिता को 
जो एक माँ के सपनों का 
लेखा जोखा रखते हैं ! 

नींद बस्ती है आँखों में 
पर दिल सोता है अपने बच्चे संग !
ओह विधाता कितना प्यारा है तू 
माँ के सपने में भी फ़िकर तू 
प्यारी रखता है ! 

अनायास ही माँ यूँ जग जाती है 
भाँपे हर ख़तरे को! 
जादूगर है या है कोई महान चित्रकार
कैसे बच्चे का सचित्र चित्रण 
तू माँ की आँखों को सौंप जाता है ! 

माँ के सपनो में एक नन्ही नन्ही फ़िकर 
का चित्रण कोई ऐसे ही 
नहीं दे जाता है !


Monday, 6 April 2020

आईना

आज अचम्भित हुई मैं, 
जब देखा सुबह आईना, 
आईने का कोई कर्म -धर्म नहीं 
क्योंकि आईना तो आईना होता है। 
मेरी छवि देख आईना बोला, 
देख ये तू ही है, 
परिपक्वता की कसौटी है आज तू,
और मैं तो आईना हूँ,
ना लेष मात्र कम ना लेष मात्र ज़्यादा,
सब कुछ साफ- साफ, 
उसे स्वीकार कर ।
जब हो परेशान, मुझसे बात कर ,
मैं दिखाऊगाँ ना, तुझे सही आईना, 
ताकि सही निणर्रय हो, 
मैं ही सत्य, मैं ही अविचल
कितना भी तोडों
पर हर टुकड़े में 
वही सच, 
क्योंकि मैं तो आईना हूँ। 
तेरा ही अक्स हूँ
जितने टुकड़े उतने ही सत्य दर्शन।
न ही मुझमें परिवर्तन की शक्ति, 
न ही बदलने की ताकत, 
किसी भ्रम में ना रहना, 
क्योंकि मैं तो आईना हूँ। 
बेशक तुम्हारी सोच का पैमाना हूँ मैं, 
पर बाहरी सच्चाई से दूर, 
आन्तरिक सच्चाई के करीब, 
तेरी आकलन की वजह हूँ मैं 
आईना हूँ मैं।

Saturday, 4 April 2020

आकांक्षा



मैंने 
कभी चाहा था 
कि चरणों पर धर सकूँ तुम्हारे 
हाथों से उतार कर 
- आकाश |

पर क्या कहूँ 
नियति के इस निष्ठुर व्यंग को ?

कि
जब थीं तुम ,
ख़ाली थे मेरे हाथ |

और आज 
जब सारा आकाश है हाथों में मेरे 
- तुम जा चुकी हो !

        

Tuesday, 31 December 2019

नव वर्ष

*ईश्वर कितनी सुन्दरता से हमारे जीवन में एक और दिन की वृद्धि करते रहते हैं*

*केवल इसलिए नहीं कि आपको इसकी जरूरत है बल्कि किसी अन्य को भी प्रतिदिन आपकी जरूरत है*

       जीवन का प्रत्येक  दिन नूतन वर्ष का शुभारंभ है। 
नव वर्ष मंगलमय हो । हर दिन सफलता सौभाग्य और समृद्धि  लेकर आए यही शुभेच्छा है।