कुदरत का वो ख़ूबसूरत प्रोग्राम जहां पता नहीं कैसे एक माँ को उसके सपनों में पता चल जाता है कि उसका बच्चा ख़तरे में है या गिरने वाला है।अमूमन ख़तरे का एहसास या उसकी प्यास , वो गीला है लगभग ऐसे सारे एहसास कैसे आपको वो कुदरत सपनो के माध्यम से दे जाता है .. उसी भाव को एक कविता का रूप देने को छोटी सी कोशिश
प्रणाम है प्रकृति के उस
रचयिता को
जो एक माँ के सपनों का
लेखा जोखा रखते हैं !
नींद बस्ती है आँखों में
पर दिल सोता है अपने बच्चे संग !
ओह विधाता कितना प्यारा है तू
माँ के सपने में भी फ़िकर तू
प्यारी रखता है !
अनायास ही माँ यूँ जग जाती है
भाँपे हर ख़तरे को!
जादूगर है या है कोई महान चित्रकार
कैसे बच्चे का सचित्र चित्रण
तू माँ की आँखों को सौंप जाता है !
माँ के सपनो में एक नन्ही नन्ही फ़िकर
का चित्रण कोई ऐसे ही
नहीं दे जाता है !
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