Saturday, 4 April 2020

आकांक्षा



मैंने 
कभी चाहा था 
कि चरणों पर धर सकूँ तुम्हारे 
हाथों से उतार कर 
- आकाश |

पर क्या कहूँ 
नियति के इस निष्ठुर व्यंग को ?

कि
जब थीं तुम ,
ख़ाली थे मेरे हाथ |

और आज 
जब सारा आकाश है हाथों में मेरे 
- तुम जा चुकी हो !

        

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