आज अचम्भित हुई मैं,
जब देखा सुबह आईना,
आईने का कोई कर्म -धर्म नहीं
क्योंकि आईना तो आईना होता है।
मेरी छवि देख आईना बोला,
देख ये तू ही है,
परिपक्वता की कसौटी है आज तू,
और मैं तो आईना हूँ,
ना लेष मात्र कम ना लेष मात्र ज़्यादा,
सब कुछ साफ- साफ,
उसे स्वीकार कर ।
जब हो परेशान, मुझसे बात कर ,
मैं दिखाऊगाँ ना, तुझे सही आईना,
ताकि सही निणर्रय हो,
मैं ही सत्य, मैं ही अविचल
कितना भी तोडों
पर हर टुकड़े में
वही सच,
क्योंकि मैं तो आईना हूँ।
तेरा ही अक्स हूँ
जितने टुकड़े उतने ही सत्य दर्शन।
न ही मुझमें परिवर्तन की शक्ति,
न ही बदलने की ताकत,
किसी भ्रम में ना रहना,
क्योंकि मैं तो आईना हूँ।
बेशक तुम्हारी सोच का पैमाना हूँ मैं,
पर बाहरी सच्चाई से दूर,
आन्तरिक सच्चाई के करीब,
तेरी आकलन की वजह हूँ मैं
आईना हूँ मैं।
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